Tuesday, March 29, 2016

इस सरज़मीं से मोहब्बत है

सरसब्ज इलाके मालवा में मुनष्य की औसत आयु का एक चौथाई हिस्सा गुजारने के बाद जब जोधपुर की सरजमीं को छुआ तो लगा जल ही जाएंगे। जून के महीने में धरा आग उगल रही थी। काली बिंधी हुई मिट्टी की जगह बिखरी पीली रेत थी, मानो मौसम का दूसरा नाम ही गुबार हो। समझ आ गया था कि एक बहुत ही प्रतिकूल वातावरण में जीवन का अनुकूल हिस्सा आ गया है। सूखता हलक और घूमता सर बीमार न था, लेकिन इस वातावरण से रूबरू होने की इजाजत मांग रहा था। इतने सूखेपन के बावजूद वहां कोई एक नहीं था जो शिकायत करता। परिधान और पगडिय़ों के चटख रंग ऐसे खिलते जैसे फूल। मुस्कुराते लब ये कहते नजर आते
            ऊंची धोती और अंगरखी, सीधो सादौ भैस।
        रैवण ने भगवान हमेसां दीजै मरुधर देस ।।
सूर्यनगरी के इस ताप को सब जैसे कुदरत का प्रसाद समझ गृहण किए हुए थे। ऐसा नहीं कि रोटी-पानी की जुगाड़ में यहां इल्म की हसरत पीछे छूट गई हो। यह यहां के कण-कण में मौजूद है। ज्ञानी और सीधे-साधे ग्वाले के बीच का यह संवाद यहां के बाशिंदे के अनुभव की पूरी गाथा कह देगा।
ज्ञानी कहते हैं- सूरज रो तप भलो, नदी रो तो जल भलो
भाई रो बल भलो, गाय रो तो दूध भलो।
यानी सूरज का तो तप अच्छा है। जल नदी का अच्छा है। भाई का बल भला है और दूध गाय का अच्छा है।
अनुभव के ताप से गुज़रा ग्वाला उत्तर देता है-
आंख रो तप भलो, कराख रो तो जल भलो।
बाहु रो तो बल भलो, मा रो तो दूध भलो
 
यानी तप तो आंख यानी अनुभव का, पानी कराख यानी कंधे पर लटकी सुराही का, बल अपनी भुजा का ही काम आता है और दूध तो मां का ही भला है।
पूरे मारवाड़ में अपनी विरासत को समेटने की होड़ थी जैसे। कई कथाकार, कवि, लेखक अरसे से अपने समय को दर्ज कर रहे थे। लंगा, मांगणियार के महान संगीत को कोमल कोठारी ने सहेजा, तो विजयदान देथा 'बिज्जी'

की कहानियां रेत से निकले वे रंग थे कि इंद्रधनुष शरमा जाए। शीन काफ निजाम साहब का कोई शेर दाद पाए बिना नहीं गुजरता था। खूबसूरत किलों, पत्थरों के इतने अद्भुत रंग के बीच सृजन का अद्भुत सिलसिला इस पूरी पट्टी को विशेष बनाता था। हबीब कैफी कहानियां लिख रहे थे तो हसन जमान अपनी हिंदी उर्दू पत्रिका शेष के साथ अशेष और अथक परिश्रम से जुड़े थे।
सरहद से लगा पाकिस्तान इस पूरे इलाके में आजादी के बाद से ही सैनिक हलचल बनाए था। गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर की 1070 किलोमीटर सीमा पाकिस्तान से लगी है। जैसलमेर जिले के पोकरण  ने ही 1998 में देश को परमाणु ताकत बख्शी। आधुनिक राजस्थान पत्थरों, प्राकृतिक गैस और खनिज संपदाओं से भरपूर है। केवलादेव की बर्ड सेंचुरी में पक्षी किलौल करते हैं तेा रणथंबोर में टाइगर की दहाड़ सुनना हर सैनी की हसरत। पूरी संभावना है कि सही दिशा देश के सबसे बड़े प्रांत को सबसे विकसित राज्य की श्रेणी में खड़ा कर सकता है। मेट्रो, पुल सड़कें, रेल जितने ही जरूरी है स्कूल और बिजली। कई ढाणियां और गांव इन सुविधाओं से वंचित है। समृद्ध विरासत के साथ जब विधिवत शिक्षा और विकास का समावेश हो जाएगा तो कोई शक नहीं कि इस प्रदेश की रफ्तार कभी नहीं थमेगी। मारवाड़ हो या मेवाड़ या फिर मेवात, ढूंढाड़ और हड़ौती, आधी दुनिया बेहद श्रमशील है, लेकिन उसका हक अब भी दबा और अधूरा है। जिस दिन यह ईमानदारी से मिल जाएगा, सूरत और बेहतर होगी। खम्मा घणी।

जो अपनी मोहब्बत को भी यहीं पनाह मिले तो क्यों न इस सरज़मीं  से मोहब्बत हो...HAPPY BIRTHDAY RAJASTHAN LUV U

3 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2298 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Asha Joglekar said...

मरुथल के साथ साथ उदयपूर जैसा झीलों का शहर भी तो है इस राजस्तान में। पानी की भी अब इतनी किल्लत ना होगी इंदिरा नहर की वजह से। इसी राजस्थान से सटे मंदसोर में काफी साल गुजारे हैं।

varsha said...

shukriya dilbAG JI ,
Ashaji aapne sahi kaha udaipur bhi hai, mount abu alwar ranthambore, bharatpur par bhi kudarat ki nemat hai.