Sunday, September 24, 2017

नूतन का नू बना न्यू और तन बना टन हो गया न्यूटन

नूतन कुमार को अपना ये नाम बिलकुल पसंद नहीं था। दोस्त उसे  चिढ़ाते थे और फिर दसवीं कक्षा में उसने  यह क्रांति कर ही दी।  अपने नाम में से नूतन का नू बनाया न्यू और तन को हटा कर  बना दिया टन, बन गया  न्यूटन , न्यूटन कुमार। 

 न्यूटन को ऑस्कर के लिए बेस्ट  विदेशी फिल्म की श्रेणी में भारत से  भेजा जा रहा है। फिल्म बर्लिन से तो सम्मान ले ही आई है क्या पता ऑस्कर भी जीत लाए। वैसे इसकी उम्मीद मुझे कितनी लगती है यह बाद में लिखूंगी लेकिन पहले फिल्म पर लगे इलज़ाम की बात कि  यह एक ईरानी फिल्म सीक्रेट बैलट की कॉपी है जिसके बारे में निर्देशक ने बड़ी मासूम सी कैफ़ीयत दी है कि सब कुछ पहले ही लिखा जा चुका है।  निर्देशन से ठीक  पहले यानी जब मैं सब  लिख चुका था तब मुझे  पता लगा कि ऐसी एक फ़िल्म है। 
    बहरहाल  सीक्रेट बैलट मैंने देखी  नहीं है, हो सकता है वह न्यूटन से  भी बेहतरीन हो लेकिन जो भारतीय समाज का लहजा और  मुहावरा न्यूटन ने पकड़ा है वह ईरानी फिल्म का नहीं हो  सकता। खासकर पहला भाग तो कमाल है जब निम्न मधयम वर्ग परिवार का न्यूटन लड़की देखने जाता है। जिस तरह से अंकिता जिसे देखने के लिए न्यूटन  परिवार आता है , उसका कशीदा किया कुशन हर सदस्य के हाथों से गुज़रता है और चाय लाने के बाद जब वह बताती है कि वह केवल नवीं कक्षा तक पढ़ी है, न्यूटन अवाक रह जाता है। अगला सवाल हॉबीज को लेकर होता है जब वह कहती है 'पिक्चरें' देखना और अपनी फेवरेट मूवी का नाम साजन चले ससुराल बताती है तो न्यूटन तो और भी हक्का-बक्का । जब न्यूटन अंकिता की उम्र पूछता है तो वह 16 बताती है और फिर तो न्यूटन वहां से उठ खड़ा होता है। वह साफ़ कहता है लड़की नाबालिग है और यह गलत है। यह शादी नहीं कर सकता।  माता-पिता लाख समझाते हैं कि एक तेरी डिग्री कम है  क्या चाटने को जो उसकी भी चाटेगा।  पढ़ी-लिखी लड़की तेरी माँ के पैर  थोड़ी दबाएगी। दस लाख रूपए दे रहे हैं और मोटर साइकिल। 

खैर अब न्यूटन का किरदार स्थापित हो चुका है कि वह कायदे के खिलाफ कुछ नहीं करेगा। वह एक पोलिंग अफसर है और जल्दी ही उसे छत्तीसगढ़ के नक्सली क्षेत्र में फ्री और फेयर चुनाव कराने जाना है। प्रशिक्षण के दौरान उसका प्रशिक्षक (संजय मिश्रा छा  जाते हैं ) उससे पूछता है कि भैया बड़े बोझ वाला नाम रख लिए हो और सारी उम्र अब इसे ढोना पड़ेगा।  तुम्हारे इस नाम में घमंड झलकता है, ईमानदारी का घमंड।  इसमें घमंड किस बात का, पूरा हिंदुस्तान इसे सहज भाव से करने लगे तो देश में कोई समस्या ही न हो। ऐसे कई दृश्य हैं न्यूटन में जब  दर्शक एक ही समय में  हँसता भी है तो कभी तीखे व्यंग्य में चुभती सुइयाँ  भी महसूस करता है। पीपली लाइव यहाँ खूब याद आती  है। 

      बंदूकों के साए में रघुवीर यादव जिनकी नौकरी का बमुश्किल एक साल बाकी है , न्यूटन के साथ हेलीकॉप्टर से नक्सली प्रभावी एरिया में उतार दिए जाते हैं। पंकज त्रिवेदी एक पुलिस ऑफिसर के रोल में हैं जो न्यूटन को कहते हैं कि आप आराम करो, वोट हम करा देंगे लेकिन वह भला कहाँ माननेवाला था।  बंदा पूरे कायदे से चुनाव कराने के वादे  के साथ सख्त सुरक्षा के बीच सदल चल देता है मतदान केंद्र की ओर। वहां एक टीचर उन्हें स्थानीय मददगार के तौर पर मिलती है जिसे भी पुलिस अफसर साथ नहीं लेना चाहते क्योंकि उनका मकसद कैसे भी कर के इस ज़िम्मेदारी को निपटा-भर देना  है।  उन्हें डर है की यह स्थानीय आदिवासी लड़की  उनकी मुश्किल बढ़ा सकती  है। रघुवीर यादव के ज़िन्दगी के तजुर्बे मज़ेदार हास्य गढ़ते हैं , मसलन वे टीचर मलकु  से पूछते हैं आप आशावादी हैं या निराशावादी तब वह कहती है मैं आदिवासी हूँ। आदिवासी क्षेत्रों में मलेरिया  का प्रकोप सर्वाधिक होता है जहाँ के मोटे-मोटे  मच्छर महामारी बनकर उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। टीचर रघुवीर यादव उर्फ़ लोकनाथ जी को चीटियां खाने का आग्रह करते हुए कहती  है कि हमारे यहाँ के  मच्छरों पर आपके इलाज काम नहीं आएंगे। बहरहाल रास्ते में जले हुए घर हैं जो पुलिस ने जलाए हैं ताकि आदिवासियों को यहाँ से खदेड़ा जा सके। वे केम्पों में शरणरार्थी बनाकर छोड़ दिए गए हैं जहाँ उन पर पुलिस अत्याचार करती है और नक्सली हमला।  पुलिस जो नक्सलियों से मुकाबले के लिए आदिवासियों का इस्तेमाल कर रही है और नक्सली जो हथियार के ज़ोर पर अपनी जनताना सरकार कायम करना चाहते हैं।ये आदिवासी दोनों तरफ से मार झेल रहे हैं। देश में ही कई तरह के शरणार्थी हमने बना दिए हैं  लेकिन बात केवल रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की होती है। यहाँ पत्रकार ह्रदयेश जोशी  की लिखी किताब लाल लकीर ज़्यादा असरकारक है जो आदिवासी शिक्षिका भीमे कुंजाम के ज़रिये बस्तर के आदिवासियों के शोषण की पूरी कथा शिद्दत से कहती है। 
फिल्म पर लौटते हैं। भारतीय सिनेमा  बदल रहा है, यह भी न्यूटन को देखकर पता चलता है। दृश्यों की चुप्पी आप महसूस करते हैं। जंगल अपने आप में मज़बूत किरदार होता है। सभी कलाकार रचनात्मक और ओरिजिनल मालूम होते हैं । श्रेय निर्देशक अमित मसूरकर को जाता है 
 आदिवासी टीचर की भूमिका में अंजलि  पाटिल बहुत बेहतर हैं। उनका पाटिल उपनाम महज़ संयोग हो सकता है लेकिन स्मिता पाटिल की याद दिलाता है।  कॉमिक अंदाज़ में न्यूटन चोट करती है लेकिन मानस पर गंभीर घाव करने से थोड़ी चूक भी जाती है। राजकुमार राव बरेली की बर्फी के बाद लगातार बेहतरीन बने हुए हैं। आखिर में फिल्म का वह संवाद  कि न्यूटन ने सब एक कर दिया अमीर-गरीब,छोटा-बड़ , राजा-रंक, ज़मीन -आसमान, इससे पहले दुनिया खेमों में बंटी हुई थी। अम्बानी गिरे या चायवाला सब एक साथ मरेंगे। न्यूटन नाम रखते ही फिल्म से भी ज़्यादा ग्रेविटी  की अपेक्षा हो जाती है जिसमें काफी हद तक वह कामयाब भी है। 

Tuesday, September 19, 2017

रेंकने वाले प्राणी की चहचहाहट


गधे की तस्वीर के साथ आए एक ट्वीट के बाद गधों की दुनिया में हलचल मच गई है :-) 


इन दिनों गधों की हज़ार सालों  की  सहनशीलता दाव पर है। सब उन्हीं  पर जुमले  बोल रहे हैं।  गधा पचीसी , धोबी का गधा न घर का ना घाट का , गधे की पहलवानी और दुलत्ती तो याद आई ही मुल्ला नसरुद्दीन ,चचा ग़ालिब और चाचा नेहरू भी जीवंत हो  गए  हैं। भला हो रेंकने वाले उस प्राणी से जुड़ी  चहचहाहट का बोले तो  उस ट्वीट का जिसने गधे पर जुमलों और किस्सों -कहानियों का पिटारा खोल कर रख दिया है।  मामला  बहुत जल्दी गधे के  सींग-सा होने वाला भी नहीं लग रहा है। 
              मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे को खूब इज़्ज़त देते थे।  चचा ग़ालिब को आम के स्वाद से बेइंतहा मोहब्बत थी। वे अपने मुग़लिया बर्तनों में उन्हें भिगो-भिगो कर उनका रस लेते थे। एक दिन इसी रसपान  के दौरान उनके दोस्त  आ पहुंचे। चचा ने आम के लिए  आग्रह किया तो उन्होंने अरुचि ज़ाहिर कर दी।  इतने में  आम की कुछ सौग़ात गधों को  भी परोसी गई, उन्होंने भी मुँह फेर लिया। चचा के मित्र ने इठलाकर कहा देखा -" गधे भी नहीं खाते। " चचा कब चूकने वाले थे तुरंत कहा-'' गधे ही नहीं खाते।"
          बहरहाल यादों के तूफ़ान में चाचा नेहरू भी शामिल कर लिए गए  हैं। पंडित नेहरू को डॉ लोहिया ने क्या-क्या नही कहा , लेकिन कोई दूरी या दरार दोनों  के बीच नही आई । शंकर कार्टूनिस्ट ने पंडित नेहरू को गधा बनाया पंडित जी ने  फोन किया - शंकर जी, गधे के साथ एक चाय पीना पसंद करेंगे ? यह आप पर है कि आप गधे को किस तरह लेते हैं। शोर तो मच ही सकता था।  तब शायद व्यंग्य  के लिए जगह थी।  हास्यबोध होता था।  इधर अब हास्य को पचा पाना  इतना मुश्किल हो गया है कि युवाओं को  यू ट्यूब में घुसना पड़ रहा है क्योंकि खुले में तो उनकी कॉमेडी किसी को पचती नहीं। वे कहते हैं यहाँ तो रोज़ पकी-पकाई स्क्रिप्ट मिल रही है। हर तरफ हास्य बिखरा पड़ा है।  बाहर से ला  और यू ट्यूब में डाल। ये युवा मसखरे कहते हैं सियाचिन में हमारे जवान लड़ रहे हैं के नाम पर आम आदमी के जीवन को ही युद्ध बना दिया गया है। अब ऐसा अगर बाहर बोले तो ज़ुबां ही  ज़िबह हो जए। नर्म आवाज़  वाली पत्रकार के साथ भी यही हो रहा है। किसको गधा कहा , क्यों कहा ? एक satire है भाई क्यों तुम्हारी समझ में नहीं आता। अब क्या इजाज़त ली जाए इसके लिए भी। वैसे अश्व प्रजाति का गधा बड़ा ही समझदार प्राणी है। कोई तो यहाँ तक कह रहा है जो गधे पर नहीं बैठा वह जन्म्या ही नहीं। 

भक्तजनों के निशाने पर रहनेवाले एक पत्रकार ने कहा कि आज के दिन इस तरह से नहीं चहचहाना था। सालगिरह का लिहाज़ किया जाना चाहिये था। 364  दिन पड़े हैं न, गरियाओ।  ये क्या बात हुई 364 दिन गरियाओ और लतियाओ और एक दिन जिस पर भी दो दिन की दुविधा है उस दिन माला पहनाओ, बत्तीसी दिखाओ। गधे की तस्वीर मत लगाओ ये क्या तर्क हुआ भला ? मैं पिछले महीने सालगिरह के बोझ से गुज़री हूँ। सोच रही हूँ उस दिन मुझे लोग केवल अच्छी अच्छी बातें बोलें और  साल भर मेरी डेश डेश करते रहें तो? ना भई आप 364 दिन मोहब्बत बरसाइये। दे लीजिये एक दिन डेश डेश मैं सह लूंगी। किसने बनाया ये कायदा कि जन्मदिन और मौत का दिन केवल तारीफ के लिए मुक़र्रर है। क्यों नहीं इस दिन भी कोई वही कहे जो वह था या थी। उसके मित्र सगे -सम्बन्धी क्यों झूठ बोलने पर मजबूर हों ?  कोई मेरी मौत पर कहे कि  बड़ी -------- थी तो कहो यार।  मैं कहाँ हूँ सुनने के लिए।  कम अज़ कम जो ज़िंदा हैं वे तो सबक लेंगे। 

         तो अभी  गधा पुराण समाप्तम नहीं है। गधों के तो दिन आए  हैं। आनंदित और रोमांचित होने के। जुमला जयंती आपको लगती होगी उन्हें वादे लगते हैं।  आपकी तकलीफ है। खामखां दूसरों पर इलज़ाम लगाते हो। उनके आनंद और रोमांच से जलते हो। छोटे दिल के। अपना आनंद रचते नहीं। सैडिस्ट कहीं के। खबरदार जो आगे ऐसी बात कही। बंद करो अपनी ज़ुबां या फिर ज़िबह होने के लिए तैयार रहो।  इस नए ट्रेंड को नहीं जानते क्या।  वैशाख नंदन की बात करने वाले। 

Friday, September 1, 2017

अरे ओ बेरंग ज़रा देख रंगों का कारबार क्या है


नोटबंदी से नोटजमा  तक का व्यंग्यात्मक खाका 
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पांच सौ का पुराना नोट दराज़ में जमे अख़बार के नीचे से निकल-निकल कर मुँह चिढ़ा रहा था और दूसरा उस लाल बक्से में से जी दीपावली की पूजा के बाद चांदी के दो सिक्कों के साथ बंद हो गया। .... और हज़ार और पांच सौ के वे दो नोट भी जो  बेटे ने अपने मुद्रा संग्रहालय के लिए ज़बरदस्ती रख लिए थे। तो कितने हुए ? कुल जमा ढाई हज़ार रुपए। अरे नहीं मैं भूल कर  रही हूँ। पांच सो का एक नोट और है जो बटुए में से निकलते हुए अल्लाह को प्यारा हो गया था यानी फट गया था। । ये तीन हज़ार रुपए का काला-धन  मुझे दो दिन से ठेंगा दिखा-दिखा कर  नाच रहा है कि थोड़ा और ज़्यादा होता तो आतंकवाद, नक्सलवाद और जालीनोट वालों की तो कमर ही टूट गयी होती।
    खैर मज़ाक नहीं यह गंभीर मसला है। पूरे देश ने महीनों अपना सफ़ेद समय इस  काले-धन को उजागर करने में लगाया है। अब क्या करें जो 99 फ़ीसदी धन बैंकों में आ गया है, ये सारा का सारा सफ़ेद थोड़ी है।  इसमें काला भी है ।  आप खामखां लगे हैं सरकार को कोसने में। आपको तो बधाई देनी चाहिए कि  अपने नागरिकों का काला धन सफ़ेद करने के लिए इतनी प्रतिबद्ध और मुस्तैद  सरकार किस देश की होती है ? सब काला आराम से सफ़ेद हो गया। गुलज़ार साहब को पता नहीं की केवल उम्र बरसकर सफ़ेद नहीं  होती, नोट भी बंद होकर सफ़ेद होते हैं। थोड़ी हींग फिटकरी लगी, नए नोट छापने में  भई इतना खर्च तो होगा ही । 
   दरअसल , आपको  दर्द एक नहीं  कई हैं। हमारी माँ ,बहनों, पत्नियों की जमा-पूंजी बेनकाब हुई तो आपको क्या तकलीफ है।  वे सड़कों पर आईं क्या विरोध प्रदर्शन करने के लिए?  भाईसाहब आंदोलन हो जाता आंदोलन अगर उनको तकलीफ होती तो। गलती इनकी ही है।  ये ससुरियां  हमेशा भविष्य की चिंता में नोटों को दबाएं रखतीं।  कभी मर्तबान में, कभी तकिये में और कभी-कभी तो सोना ही गढ़वा लेतीं। इतने पवित्र देश में ऐसी चोरी सांस्कृतिक लज्जा की बात है। ये सब गड़ा धन जब सामने आया तो पति ने कूट भी दिया। क्या करता बेचारा।
     उस दिन मुन्नू  का बापू सुबह से ही चिल्ला रहा था। पिछले साल जब  नई  साइकिल के लिए पैसे मांगे तब कहने लगी नहीं हैं मेरे पास। मुन्नू  की माँ तुमसे तो  भगवान ही निपटेगा। मुन्नू  की माँ ने जैसे ही मुँह खोला कि पिछली बार जब दिए थे, तुम दारू पीकर पड़े रहे थे कित्ते दिन। मुन्नू का बापू उसकी और लपकते हुए चिल्लाया- "ज़बान लड़ाती है, चल निकल यहाँ से , बैंक जा और  नोट बदलवा।" मुन्नू  की माँ बच्चे को लेकर घर से निकल गई  और मुन्नू  का बापू दुखी होकर घर में पसर गया।  उसका मजदूरी के लिए चोखटी पर जाने का टाइम निकल चुका  था। मुन्नू  की माँ  बिना खाए-पिए लगातार कुछ दिनों तक बैंक की लम्बी लाइन में लगती रही। सोच रही थी बहुत दिनों से कोई व्रत नहीं किया था , अब इकट्ठे ही हो गए।  मुन्नू  को बिस्कुट का पैकेट लेकर दे देती थी। कुछ दिनों में पैसे मिल गए लेकिन वह नादान अपनी इस उपलब्धि पर खुश ही नहीं हो पा रही थी। इतने सुंदर करारे जामुनी नोट मिले वह फिर भी दुखी थी। अब उसे कौन समझाता की यह काले नहीं, इस रंगीन धन को देखने का समय  है । काले की बजाय  इसमें छिपी कला को देख। इतने मुड़े-तुड़े नोट के बदले  नए और रंगीन  नोट पाकर भी खुश नहीं होते ये लोग।  कभी किसी का शुक्रिया अदा नहीं करते, इसलिए पिछड़े ही  रहते हैं । नोटबंदी-नोटबंदी कर  रहे हैं। कभी ऐसी नोटबदली की है किसी ने इनके साथ ? भलाई का तो समय ही नहीं रहा। 
  एक और हैं, उनका नाम लाली है। कमबख्त को जब उसके बच्चे  ने आकर नोटबंदी के बारे में बताया तो भागी -भागी पंसारी के पास गई। उसने साफ़ कहा सबका राशन लेना पड़ेगा मैं छुट्टा  नहीं दूंगा। उसे तो पंसारी भगवान मालूम हुआ। देसी घी, आटा, चावल, बूरा सब ले आयी। हज़ार रुपए पूरे। कल की  कल देखेंगे। इस लाली को कौन समझाए। कभी इतना घी खाया था पिछले दिनों। खीर, पूड़ी, हलवा खाकर भी  सरकार को कोस रही है। 
         क्या हुआ जो सौ-सवासो इस अभियान में शहीद हो गए। बाज़ार में पैसा आया है।  लोगों को आसान दरों पर क़र्ज़ मिला है। देश बदलने के लिए शहादत तो देनी ही पड़ती है। आपको अपनी जान की पड़ी है , आपने  प्रधान सेवक की आँख में आसूं नहीं देखे थे क्या? स्वार्थी और निष्ठुर कहीं के।  आपको वो आसूं देखने चाहिए थे। आप सिर्फ  एक ही चश्में से हर चीज़  देखते हैं। आपका कुछ नहीं हो सकता।  ये चश्मा उतारिये पहले। आपको आलोचना में ही आनन्द  आता है। आप देश हित  के बारे में सोच ही नहीं सकते। यही 8 नवंबर की रात से कर रहे हो और अब जब 99 फीसदी पैसा वापस आ गया है तब भी वही कर रहे हो। आपकी समझ ही मोटी है। आप काम-धंधे बंद होने और नौकरी जाने की झूठी बात करते हो। आप देशद्रोही हो। आज का युवा नौकरी देता है करता नहीं। सत्तर सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। 
दराज़ में रखा वह  500 का पुराना  नोट फिर उछल -उछल कर कह रहा था अरी ओ दृष्टिहीन मैं हरा नहीं काला हूँ।  फेंक दे मुझे। इसे रखना ग़ैर क़ानूनी है।